Monday, April 7, 2008

मन

एक चुप्पी सी लगी हैं अंदर आग सी जली हैं
दर्द कराहता हैं बाहर आने को
कौन सा माध्यम अपनाऊं जतलाने को
नम आँखें जब आँसू बहाए
भारी मन तनिक हल्का हो जाए
मन की गुत्थी खेले कबड्डी
ना चित ना पट पर होए जिद्दी
दिग्भ्रमित हो मन भागा जाए
पर कड़क के कुछ पकड़ ना पाए
बौछार शुरू होती बद-दुआओं की
कभी खुदी तो कभी खुदा
बड़-बड़ बड़-बड़ करता जाए
रोक ना पाए कोई मन को
कभी लाचार तो कभी क्रोध का प्रहार
ये रोता भी हैं ये हँसता भी हैं
ये हैं मन , ये है मन

Thursday, January 3, 2008

जाने कितने

जाने कितने आँसू बिखड़े
जाने कितने अरमानों के टुकड़े
छण में टूटे सारे सपने
सनसनाहट ने लूटी दूनिया अपनी
सनसनी-सी दौड़ी रग मे
कपकपी-सी सिंची तन मे
नीर की धारा बहती नयनो से
ग़म का सागर ऊपर उठता
जाए हमसे
थक चुकी हूँ अंदर से
मर चुकी हूँ हर दम में
अब बस कर ऊपर वाले
अब दर्द भी मुझसे आँखें मीचे बैठा है
माँगा था तुझसे अनमोल रतन
देकर कर दिया तूने बड़ा जतन
अब दर्द भी मुझ पे रोती है
ख़ुसी क्यूँ अंदर सोती है
की थी तुमसे आईने की गुहार
पर तुमने तो भेजा भ्रम का उपहार
सोच कर की तेरा तौफ़ा है
ग्रूर में नाच पड़ी थी मैं
दिन रात ख़ुद को ही निहारा
मेरी ही नज़रों से टूट पड़ा वो
क्या खोटा तूने भेजा था
ज़रा सी ठनक की, टूट पड़ा वो
टूटा सो टूटा
पर कितने जख़्म दे गया वो
जख़्म तो दवा ने भर डाली
पर यादों को कर सका ना ख़ाली
दाग कितने मुझ पर छोड गया वो
ना जाने कितना मुझे तोड़ गया वो

आज अभी मैं जी लूँगी

हर कुछ मैं समझी बैठी हूँ
ख़ुद में कितनी सुलझी रहती हूँ
पर फिर भी मन का भँवर
जब हिलोरें लेता है
आज़ाद पन्छि-सी उड़ लेती हूँ
उड़ते उड़ते जा कहीं जब टकराती हूँ
फिर ख़ुद को कहीं घायल पाती हूँ
हर सवेरे वचन लेती हूँ
फिर ना……. उडूँगी
पर फिर भी पतंग-सी
कहीं से कहीं उड़ लेती हूँ
कटते जब मेरे धागे हैं
गिर पड़ लंगड़ी लूढ़ी हो जाती हूँ
पर ख़ुद से बाज़ नही आती हूँ
रोकूं बांधू मन को कब तक
ये मेरे पर हैं, ये मेरी इक्छा
टूटे तो सह लूँगी
ख़ुद को हर कुछ कह लूँगी
पर फिर भी आज़ाद हवाओं में
आज
अभी मैं जी लूँगी

Saturday, December 22, 2007

बोझ

घड़ी-घड़ी मैं आगे बढ़ता, जोश बढ़ता जाता है
एक मुद्दा को पकड़ मैं आगे बढ़ता
हल करना ध्येय बन जाता है, आग कलेजे में उठति है
करनी तो अब करनी है, तू समर्पित मै समर्पित
जब ना होता कोई बोझ तो सबसे बड़ा बोझ बन जाता हूँ

गर्त को छूना ध्येय बन जाता है
तपस्या कहो या आनन्द, सुकून इसी में आता है
समस्या हल कर, कर बंद दरवाज़े को
नई दस्तक देने को आगे बढ़ जाता हूँ
जब ना होता कोई बोझ तो सबसे बड़ा बोझ बन जाता हूँूँ

मोह की काया मेरी काया से चल पड़ी है कहीं दूर
ख़ुद के लिए जीना को जीना क्या कहना
कर समर्पित दूजी की खातिर, आनंद उसी में आता है
ख़ुशी की ज्वाला ख़ुद मे फूटती, जब मैं नव स्वरूप दे जाता हूँ
जब ना होता कोई बोझ तो सबसे बड़ा बोझ बन जाता हूँ

Saturday, December 8, 2007

भावधारा

कुछ चीज़ें जो रुकती नहीं
कभी भी हमसे कुछ पूछती नहीं
क्या मुझे अंदर आना है ?
कहना ना कहना कुछ समझती नही
दस्तक चौखट पे करती नही
हक से हाज़िर हो जाती है
ये भावधारा है
जो हमसे कुछ पूछती नही

मन के हबीब मे
यादों के क़रीब मे
कभी भी कोई भी
उड़ान भर लेती है
डोर जितनी खींचो
दिशा बदल फिर से
उङान लेती है
किधर को जाना
कब को जाना
हर पल बदलती रहती है
ये भावधारा है
जो हमसे कुछ पूछती नही

समय के मजधार मे
दो घड़ी प्यार मे
कुछ सुकून सा छू जाता है
आँखें बंद में प्यार से
कभी कुछ अच्छा कह जाता है
अंकुश ना कोई निरंकुश है ये
ये भावधारा है
जो हमसे कुछ पूछती नही

Thursday, December 6, 2007

छण भंगुर-सा मन

बैठती शांत हूँ पर रहती अशांत हूँ
है छण भंगुर-सा मेरा मन

पल मे छण, छण मे पल, पल-छण, छण-पल
मन के मल्युद्ध में, पल मे नवीन, छण मे छीण
है कितनी मन मष्तिस्क की कल्पनाएँ नवीन
ये है मेरा छण भंगुर-सा मन

तरंग लाती है कभी सूनामी
तो कभी बैठ जाता है सुसुप्त हो के पानी
चुल-बुल चुल-बुल बुल-बुल बुल-बुल
दौरा भागा-सा भागाभागा-सा
है छण भंगुर-सा मेरा मन

समेत लेती हूँ असीम ब्रह्म को कभी अपने अंदर
तो कभी खो जाती हूँ नन्ही बूंदो के अंदर
खोजती ढूँढती, ख़ुद को आकांशाओं के दलदले में
पहुँच जाती हूँ कहीं गुमनाम शहर के किनारों पे
है छण भंगुर-सा मेरा मन

ख़ुद को समझ नही पति, कुच्छ कह नही पति
इसलिए कहती हूँ छण भंगुर-सा है मेरा मन

Tuesday, December 4, 2007

हम तुमसे कभी नहीं मिलेंगे

तुम तो चल पड़े आँखों से ओझल हो
रुक्सत का वक़्त तक ना बताया
आधीर हो पड़े थे तुमसे मिलने को
पर तुम्मे ख़ुद के लिए एक शिकन तक ना पाया

दर्द में हम रो पड़े थे
और आँखे नम हों चुकी थी
ढलता मन फिर भी
उम्मीद के वाण चढ़ाए बैठा था
एक बार तो तुम आओगे
पर हालत ने तुम्हें ख़ुदगर्ज बना डाला
ख़ुदगर्ज़ी के भेद में
तुमने हमें अध्याय बना डाला

आज भी वो पल पकड़ बैठे हैं हम
हमने तुम्हें पूरी किताब बना डाला
इसलिए आज ख़ुद से कहते है
ख़ुद से खुदाई नहीं करेंगे
और हम तुमसे कभी नहीं मिलेंगे

उम्मीद (२००४)

आज के इंसान से उम्मीद
एक मृग-तृष्णा है
मन का भ्रम है
करो और ना मिले
तो चकनाचूर तुम होते हो
और ना करो तब मिले तो
अलौकिक ख़ुशी तुम्हें भेंट चढ़ जाती है
पर फिर भी ये मन
उम्मीद की ही चढ़ाइयाँ ही चढ़ता है

हर कामना फुटकर पूरी करो
तुम पर उम्मीद की होड़ ना पकड़ो तुम
वक़्त पे सब साथ छोड़ जाएँगे
सिर अपना पीछे मोड़ जाएँगे
पहचाने को भी गैर पाएँगे
स्वार्थ निकला
बस तब तक साथ निभाएँगे
पर फिर भी ये मन
उम्मीद की ही चढ़ाइयाँ चढ़ता है

साख पकनी है तो उस वक़्त का पकड़ो
जो किसी के लिए ना ठेह्रा है
ना आगे ना पीछे किसी का इंतज़ार
मूक वो बढ़ता ही जा रहा है
बस अपनी कहानियाँ गढ़ता ही जा रहा है
ख़ुद से जुरा सबों से जुदा
वक़्त उम्मीद के पीछे ना रहा है